विचारों से बनेगा बदलाव: उरई में अंबेडकर–फुले स्मृति में वैचारिक समागम


उरई। जन संघर्ष मोर्चा के तत्वावधान में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा ज्योतिबा फुले की स्मृति में रविवार दोपहर रघुवीर धाम सभा गृह में एक विशाल वैचारिक समागम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व विधायक संतराम कुशवाहा ने की, जबकि संचालन मोर्चा संयोजक कामरेड गिरेंद्र सिंह ने किया।
मुख्य वक्ता के रूप में लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर रविकांत चंदन ने कहा कि किसी जाति विशेष में जन्म लेने मात्र से कोई अंबेडकरवादी नहीं बन जाता, बल्कि अंबेडकरवाद को समझकर और अपनाकर अर्जित करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि बाबा साहब के ऐतिहासिक हस्तक्षेप के कारण ही भारत में महिलाओं को पहले आम चुनाव में ही मताधिकार मिला, जबकि कई विकसित देशों में महिलाओं को इसके लिए दशकों तक संघर्ष करना पड़ा।
युवा चिंतक नीरज भाई पटेल ने अपने वक्तव्य में कहा कि आरक्षण को लेकर ‘मेरिट’ पर सवाल उठाने वालों को पहले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के संदर्भ में भी समान दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाबा साहब के विचार मानवतावादी थे और उनमें किसी जाति या वर्ग के प्रति प्रतिशोध की भावना नहीं थी।
वरिष्ठ पत्रकार के.पी. सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. अंबेडकर एकपक्षीय आलोचक नहीं थे। उन्होंने मनुस्मृति की आलोचना की, लेकिन उसके कुछ प्रावधानों—जैसे बेटियों को संपत्ति में हिस्सेदारी—का भी उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि बाबा साहब ने लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका को रेखांकित करते हुए वैदिक परंपराओं का उदाहरण दिया था, जो उनकी संतुलित और सकारात्मक सोच को दर्शाता है।
डीवी कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. राम प्रताप ने संविधान के माध्यम से भारत में मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव रखने के लिए बाबा साहब के योगदान को सराहा।
कार्यक्रम में पूर्व विधायक कप्तान सिंह राजपूत, रामकृष्ण शुक्ला, अशोक गुप्ता महाबली, इप्टा अध्यक्ष देवेंद्र शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा, चौधरी जयकरन सिंह, पूर्व ब्लॉक प्रमुख राखी राजपूत, कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष श्याम सुंदर चौधरी, महेश शिरोमणि, बसपा नेता राम शरण जाटव, महेश विश्वकर्मा, दुलीचंद्र विश्वकर्मा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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