(अनिल शर्मा)
बांदा (उत्तर प्रदेश)। आधुनिक युग के सशक्त जनकवि केदार नाथ अग्रवाल को उनकी 115वीं जयंती पर साहित्य प्रेमियों और अधिवक्ताओं ने बांदा जिला न्यायालय परिसर में स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर याद किया। यह आयोजन 1 अप्रैल को प्रातः काल हुआ, जिसमें उनके व्यक्तित्व एवं काव्य विस्तार पर विचार-विमर्श किया गया।
चर्चा का शुभारंभ करते हुए सुधीर सिंह ने कहा कि समय के साथ केदार जी का लेखन और अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है। उनके साहित्य पर शोध और अध्ययन का जो प्रसार आज हो रहा है, वह उनके जीवनकाल में भी नहीं देखने को मिला था।
वरिष्ठ संपादक-लेखक गोपाल गोयल ने संस्मरण सुनाते हुए बताया कि वह सन् 1982 में जबलपुर में हरिशंकर परसाई द्वारा आयोजित केदार जी के षष्टीपूर्ति समारोह में शामिल हुए थे, जिसमें मुल्कराज आनंद जैसी हस्तियों ने भी भाग लिया था। वरिष्ठ कवि जवाहर लाल जलज ने कहा कि केदार जी की रचना और विचार में कोई अंतर नहीं था।
वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने अपने पिता एवं पूर्व सांसद राम रतन शर्मा के संदर्भ में बताया कि वह वकालत में केदार जी के जूनियर थे। लेकिन जब राम रतन शर्मा जनसंघ से सांसद बने, तो केदार जी ने उनसे कुछ दूरी बना ली। बावजूद इसके, पिता जी ने अंतिम सांस तक केदार बाबू को अपना गुरु माना और अपने कटरा स्थित घर में उनकी अध्यक्षता में कई काव्य गोष्ठियाँ करवाईं। अनिल शर्मा ने बताया कि केदार जी को यह आशंका बनी रहती थी कि प्रगतिशील कवियों, संगठन या कम्युनिस्ट पार्टी में उनकी इस मित्रता को लेकर आलोचना न हो जाए। वह अपनी छवि को लेकर बहुत सचेत रहते थे। उन्होंने बताया कि उनके पिता के बाद वह और उनके छोटे भाई जीतू (अशोक त्रिपाठी) आज भी केदार जी के साहित्यिक शिष्य बने हुए हैं।
कवि केशव तिवारी ने केदार जी से जुड़े अपने संस्मरण सुनाए। अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष आनंद सिन्हा और अशोक त्रिपाठी 'जीतू' ने भी वकालत में केदार जी के साथ काम करने के अनुभव साझा किए। कार्यक्रम का संचालन अनूप राज सिंह ने किया।
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