बहाना कोई भी लेकर मुझे हर दिन चिढ़ाता था, न जाने क्यों कभी गुस्सा न आता था: ऋतु चतुर्वेदी


जालौन। बाराहीं देवी मेला एवं विकास प्रदर्शनी में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में शनिवार की रात अखिल भारतीय कवि सम्मेलन व मुशायरा का आयोजन किया गया। कवि और शायरों की  प्रस्तुतियां सुनकर श्रोतागण वाह वाह कर उठे। 

    कवि सम्मेलन की शुरूआत अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात कवि रवींद्र शर्मा व पालिकाध्यक्ष प्रतिनिधि पुनीत मित्तल द्वारा मां सरस्वती के चित्र के समक्षी दीप प्रज्ज्वलित कर की गई। ऋतु चतुर्वेदी कोंच द्वारा मां वीणा वादिनी की वंदना प्रस्तुत की गई। उनके गाए गीत ‘‘बहाना कोई भी लेकर मुझे हर दिन चिढ़ाता था, न जाने क्यों मुझे फिर भी कभी गुस्सा न आता था’’ सुनकर श्रोता झूम उठे। डा. मकीन सिद्दीकी की गजल ‘‘मेरे हिस्से का सूरज खा गया वो, मुझे खुद को जालाना पड़ रहा है।’’ को सुनकर श्रोता तालियां बजाने को मजबूर हो गए। हास्य कवि प्रदीप दिहुलिया चरखारी ने जब ‘‘चाहते हो जीवन को सफल बनाना यदि, पत्नी की हां में हां मिलाते जाइए।’’ पढ़ा तो श्रोता काफी देर तक खिलखिलाते रहे। शायरा शमीम कौशर आगरा ने पढ़ा ‘‘वो किस गली में आएंगे कुछ तो खबर मिले, ये आरजू है उनकी नजर से नजर मिले।’’ गरिमा जालौनी ने पढ़ा ‘‘न मैं राधा बनी न मैं रूकमणि बनी, सांवरी बन गई मैं सांवरे के लिए।’’ महेंद्र मिहोनवी ने पढ़ा ‘‘कोई काम न दूजा सांपों की सिर्फ पूजा, तुम जहर से लबालब भर तो नहीं गए हो।’’ संजीव कुलश्रेष्ठ पुखरायां ने पढ़ा ‘‘सफर सहेजे हुए नींद के सताए हैं, गमों की गोद में रहकर भी मुस्कुराते हैं।’’ खलील कैफी ने पढ़ा ‘‘मुल्क में मेरे कैसी फिजा परस्ती आई, भाई के हाथ में तलवार चलती आई।’यूसुफ अंजान ने पढ़ा ‘‘हमारा जिस्ट ही लौटा है फकत घर अपने, हमारे जहन में वो वादियां अभी तक हैं।’ कार्यक्रम संयोजक अंचल शर्मा ने ‘तनहाइयां हमारी मिटाने नहीं आते, उनके बगैर मौसम सुहाने नहीं आते।पढ़कर लोगों को उनके प्यार की याद दिला दी। कार्यक्रम का संचालन करीम खां करीम ने किया।
फोटो परिचय-कार्यक्रम में प्रस्तुति देती कवियत्री ऋतु चतुर्वेदी। 

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