कालपी की हीरापुर खदान में 45 करोड़ के तटबंध को तोड़कर अवैध खनन की तैयारी,



 
---यमुना पुल के पिलरों पर मंडराया खतरा
 जालौन जिले के कालपी क्षेत्र की हीरापुर मौरम खदान में सरकारी खजाने की बड़ी चोरी और सार्वजनिक संपत्ति से खिलवाड़ का मामला सामने आया है। रसूखदार ठेकेदारों द्वारा जलशक्ति मंत्रालय से 45 करोड़ रुपये की लागत से बनवाए गए तटबंध (सुरक्षा बांध) को जानबूझकर क्षतिग्रस्त कर दिया गया है। इस तटबंध को तोड़ने का एकमात्र उद्देश्य खदान के खंड संख्या 2, 3 और 4 में हीरे और मोंटी जैसी कीमती रेती (बालू) के अवैध खनन का रास्ता साफ करना है।
    सूत्रों के मुताबिक, ठेकेदार ने प्रशासन की चुप्पी का फायदा उठाते हुए इस अवैध कार्य को अंजाम देने के लिए पूरी तैयारी कर ली है। क्षेत्र में इन दिनों दबंगई का ऐसा माहौल है कि ठेकेदार ने अपने इरादों को अंजाम देने के लिए स्थानीय भौकाली तत्वों को अपने साथ ले रखा है। ये लोग खुलेआम लंगोट पहनकर अवैध खनन की तैयारी में जुटे हुए हैं, मानो प्रशासन और कानून उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।
हालांकि, असली मुद्दा सिर्फ यमुना की रेती का अवैध खनन नहीं है, बल्कि इससे भी गंभीर मामला यह है कि मंगरोल के रास्ते खदान के खंड संख्या 2, 3 और 4 तक भारी वाहनों की आसान पहुंच बनाने के लिए 45 करोड़ रुपये की लागत से बने तटबंध को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया जा रहा है। यह तटबंध बाढ़ नियंत्रण और आस-पास के इलाकों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। इसे तोड़ना सीधे तौर पर हजारों करोड़ के सार्वजनिक धन से बने बुनियादी ढांचे से खिलवाड़ के बराबर है।
   सबसे चिंताजनक और खतरनाक पहलू यह सामने आया है कि खनन ठेकेदार यमुना नदी पर बने पुल की सुरक्षा से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ठेकेदारों द्वारा पुल के पिलरों के आसपास की मिट्टी को हटाकर (अवैध खनन करके) पुल की नींव को सीधे तौर पर कमजोर किया जा रहा है। ऐसा करके वे पुल तक पहुंचने के लिए एक वैकल्पिक रास्ता बना रहे हैं। यह हरकत उत्तराखंड के देहरादून और झारखंड के खूंटी जैसे उन इलाकों की याद दिलाती है, जहां नदी से अवैध खनन के चलते पुल के पिलर कमजोर हो गए और हादसों का खतरा पैदा हो गया .
प्रशासन की भूमिका और राजनीतिक रसूख:

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक मशीनरी की संलिप्तता और मौन रवैये को लेकर खड़ा होता है। आरोप है कि ठेकेदार बेहद रसूखदार है और उसके प्रशासनिक अफसरों से गहरे तार जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। स्थानीय स्तर पर "प्रशासन की संलिप्तता को ए जाना या बो जाना" (नजरअंदाज करना) जैसी बातें जोरों पर हैं, जिससे आम जनता में यह संदेश जा रहा है कि अफसर इस अवैध कारोबार में शामिल हैं या फिर दबाव में हैं।
राज्य सेतु निगम और UPPWD के अफसरों पर भी सवाल:

इतना ही नहीं, इस गंभीर मामले में राज्य सेतु निगम और उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम (UPPWD) के अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध बनी हुई है। पुल की पिलरों से मिट्टी हटाए जाने के बावजूद ये विभाग पूरी तरह से मौन हैं। यह सवाल उठता है कि आखिर क्यों ये विभाग अपनी संपत्ति (पुल) को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं? भले ही इस अवैध खनन के चक्कर में कोई बड़ी घटना हो जाए, लेकिन अधिकारी ठेकेदार के ठसक और रसूख के आगे बेबस नजर आ रहे हैं।
ज्ञातव्य है कि हाल ही में जालौन जिले के कालपी क्षेत्र में अवैध खनन के मामले सामने आते रहे हैं और खनिज विभाग की टीम ने कुछ वाहन भी पकड़े थे , लेकिन बड़े ठेकेदारों पर शिकंजा कसने की बात नहीं हो पाई है। यह मामला उस सीमा को भी पार कर गया है जहां सिर्फ बालू की चोरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति (तटबंध) और यातायात के महत्वपूर्ण साधन (पुल) से खिलवाड़ हो रहा है।
मांग की जा रही है कि उच्च स्तरीय जांच कर इस पूरे मामले में ठेकेदार और प्रशासनिक अधिकारियों की संलिप्तता की जांच की जाए और तटबंध एवं पिलरों को हुए नुकसान का आकलन कर तत्काल मरम्मत कराई जाए।
 

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