सुरेश खरकया
जालौन । उरई विकास प्राधिकरण (ओडीए) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। विकास या विकास के नाम पर चयनात्मक कार्रवाई और वसूली के आरोपों के बीच आज सुबह हुई एक घटना ने आम जनता व व्यापारियों के बीच कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुबह-सुबह ओडीए की टीम, जिसमें सचिव परमानंद यादव और वरिष्ठ कोष अधिकारी आशुतोष चतुर्वेदी भारी पुलिस बल के साथ शामिल थे, मंशापूर्ण मंदिर के पास स्थित बजरंग होटल में संचालित प्रमुख शोरूम ‘एलेन सॉली’ पहुंची और वहां ताला डाल दिया। इसके ठीक सामने स्थित चंद्रकांत विला पर भी इसी तरह की कार्रवाई की गई। अधिकारियों का कहना था कि संबंधित निर्माण का नक्शा पास नहीं है।
कार्रवाई से उठते सवाल: 8 साल बाद क्यों जागा विभाग?
हालांकि, इस कार्रवाई ने व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों को चौंका दिया। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि नक्शा पास नहीं था, तो निर्माण कार्य को पहले ही क्यों नहीं रोका गया? जब भवन पूरी तरह बन चुका है और दुकानें पिछले 8 वर्षों से संचालित हो रही हैं, तब अचानक ताला डालने की कार्रवाई क्या दर्शाती है? क्या सोता हुआ विभाग अचानक जाग गया, या इसके पीछे कोई और ‘खेल’ है?
स्थानीय व्यापारियों का आरोप है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। शहर में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां पहले नोटिस दिया जाता है, फिर अचानक सीलिंग की कार्रवाई होती है और बाद में किसी न किसी तरीके से मामला शांत हो जाता है। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि विकास प्राधिकरण की कार्रवाई पारदर्शी नहीं है, बल्कि चयनात्मक है।
विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन पीछे हटा
घटना उस समय और नाटकीय हो गई, जब शोरूम के मालिक अंजनी दुबे उर्फ बबलू दुबे ने विरोध स्वरूप सड़क पर बैठकर कपड़े फाड़ दिए और पेट्रोल डालने तक की कोशिश की, जिससे माहौल अत्यधिक तनावपूर्ण हो गया। स्थिति बिगड़ती देख प्रशासन हरकत में आया और आनन-फानन में दुकान का ताला खुलवा दिया गया।
व्यापारी वर्ग पहले से ही विकास के नाम पर कथित वसूली से परेशान बताया जा रहा है। हाईवे किनारे चल रहे कई निर्माण कार्य इसी कारण रुक गए हैं। उद्योग व्यापार मंडल ने इस कार्रवाई का विरोध जताते हुए इसे मनमानी करार दिया है।
और कई प्रतिष्ठान दबाव में : क्या है असली मंशा?
सूत्रों के अनुसार, शहर के कई अन्य प्रतिष्ठान—चाहे वह संजय बुक डिपो वालों का होटल हो, रूसिया फर्नीचर शोरूम, दिवोलिया पेट्रोल पंप या अन्य व्यावसायिक संस्थान—भी इसी तरह के नोटिसों और दबाव का सामना कर रहे हैं। आरोप यह भी है कि कई मामलों में वर्षों तक नोटिस लंबित रहते हैं, लेकिन कार्रवाई केवल उन्हीं पर होती है जो कथित तौर पर “सहयोग” नहीं करते।
उरई की आम जनता और व्यापारी अब यह जानना चाहते हैं कि विकास प्राधिकरण का असली उद्देश्य क्या है—वास्तविक विकास, या फिर विकास के नाम पर दबाव और वसूली? इस पूरे प्रकरण ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है और निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो रही है।
कैसे होता है नोटिस का खेल?
उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम 1973 की धारा 27 की उपधारा (1) के अधीन, उरई विकास प्राधिकरण पहले ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी करता है। इसमें धमकी भरी भाषा में लिखा होता है कि बिना प्राधिकरण की अनुज्ञा के निर्माण किया गया है। धारा 14 एवं 15 के तहत कार्रवाई का उल्लेख करते हुए एक तारीख निहित कर दी जाती है, जिसमें पक्षकार को प्राधिकरण में अपना पक्ष रखना होता है। नोटिस में यह भी स्पष्ट लिखा होता है कि "क्यों न आपका पूर्व निर्माण गिरा देने का आदेश पारित कर दिया जाए।"
इस भाषा से आम आदमी घबरा जाता है और सीधे विकास प्राधिकरण पहुंचता है। वहीं से शुरू होता है वसूली का खेल। यदि कोई वहां के वरिष्ठ अधिकारियों को ‘संतुष्ट’ कर देता है, तो नोटिस वहीं दब जाता है। नहीं तो तीन-चार महीने के भीतर बिल्डिंग सील करने की कार्रवाई पक्की समझो।
जोनों का बंटवारा और अधिकारियों की भूमिका
उरई विकास प्राधिकरण ने अपने अंतर्गत आने वाले 32 गांवों एवं उरई शहर को 7 जोन में बांटा है। सूत्रों के अनुसार, इस बंटवारे में शहर के दो मुख्य जोन वरिष्ठ कोषाधिकारी आशुतोष चतुर्वेदी को दे दिए गए हैं, जबकि बाहरी क्षेत्रों के जोन सचिव ओडीए परमानंद यादव के पास हैं। यह विभाजन इस विवाद की जड़ में यह सवाल खड़ा करता है कि कहीं यह चयनात्मक कार्रवाई इन्हीं जोन के अंतर्गत तो नहीं हो रही। फिलहाल, दोनों अधिकारियों का कहना है कि कार्रवाई नियमानुसार की गई, लेकिन व्यापारी संघ इसे ‘पास-फेल के खेल’ का हिस्सा बता रहे हैं।
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